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आ श्रा॑व॒येति॑ स्तो॒त्रियाः॑ प्रत्याश्रा॒वोऽअनु॑रूपः। यजेति॑ धाय्यारू॒पं प्र॑गा॒था ये॑यजाम॒हाः ॥२४ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ। श्रा॒व॒य॒ इति॑। स्तो॒त्रियाः॑। प्र॒त्या॒श्रा॒व इति॑ प्रतिऽआश्रा॒वः। अनु॑रूप॒ इत्यनु॑ऽरूपः। यजा॒इति॑। धा॒य्या॒रू॒पमिति॑ धाय्याऽरू॒पम्। प्र॒गा॒था इति॑ प्रऽगा॒थाः। ये॒य॒जा॒म॒हा इति॑ येऽयजाम॒हाः ॥२४ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:19» मन्त्र:24


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

कैसे विद्वान् होते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! तू विद्यार्थियों को विद्या (आ, श्रावय) सब प्रकार से सुना, जो (स्तोत्रियाः) स्तुति करने योग्य हैं, उनको (प्रत्याश्रावः) पीछे सुनाया जाता है और (अनुरूपः) अनुकूल जैसा यज्ञ है, वैसे (येयजामहाः) जो यज्ञ करते हैं (इति) इस प्रकार अर्थात् उन के समान (प्रगाथाः) जो अच्छे प्रकार गान किये जाते हैं, उनको (यजेति) सङ्गत कर, इस प्रकार (धाय्यारूपम्) धारण करने योग्य रूप को यथावत् जानें ॥२४ ॥
भावार्थभाषाः - जो परस्पर प्रीति से विद्या के विषयों को सुनते और सुनाते हैं, वे विद्वान् होते हैं ॥२४ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

कथं विद्वांसो भवन्तीत्युपदिश्यते ॥

अन्वय:

(आ) समन्तात् (श्रावय) विद्योपदेशान् कुरु (इति) प्रकारार्थे (स्तोत्रियाः) ये स्तोत्राण्यर्हन्ति ते (प्रत्याश्रावः) यः प्रतिश्राव्यते सः (अनुरूपः) अनुकूलः (यजा इति) (धाय्यारूपम्) या धेयमर्हा तस्या रूपम् (प्रगाथाः) ये प्रकर्षेण गीयन्ते ते (येयजामहाः) ये भृशं यजन्ति ते ॥२४ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वंस्त्वं विद्यार्थिन आश्रावय। ये स्तोत्रियास्तान् प्रत्याश्रावोऽनुरूप इति येयजामहाः प्रगाथा इति यजेति धाय्यारूपं यथावत् जानीहि ॥२४ ॥
भावार्थभाषाः - ये परस्परं प्रीत्या विद्याविषयान् शृण्वन्ति श्रावयन्ति च, ते विद्वांसो जायन्ते ॥२४ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे लोक परस्पर प्रेमाने विद्येचे श्रवण करतात व इतरांनाही ऐकवितात ते विद्वान असतात.